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शेयर बाजार- उलझी राजनीति, टेढ़ा अर्थशास्त्र

                        आलोक पुराणिक

      फिर हल्ला सेनसेक्स पर, अबकी बार गिरावट पर।

      22 सितंबर, 2005 को मुंबई शेयर बाजार का संवेदनशील सूचकांक यानी सेनसेक्स एक दिन में 265 बिंदु गिर गया। हाहाकार मचा कि  करीब 1,16,100 करोड़ रुपये बाजार में लुट गये यानी एक शेयरों के भावों में इतनी गिरावट हो गयी।

      चिंताएं हैं, सर्वत्र चिताएं हैं। सेबी यानी सिक्योरिटी ऐंड एक्सचेंज बोर्ड  आफ इंडिया चिंतित है। भारत सरकार चिंतित है। आईबी, सीबीआई जैसे एजेंसियां तक चिंतित हैं कि आखिर ये हो क्या हो रहा है। सेनसेक्स आठ हजार के पार कैसे चला गया। पर इस मसले का समग्र विश्लेषण करने पर तीन आयाम सामने आते हैं-एक राजनीतिक, दूसरा आर्थिक और तीसरा वित्तीय।

      शेयर बाजार की राजनीति बहुत पेचीदा है। शेयर बाजार बहुत नीचे जाये, तो सरकार को शर्म आती है कि हाय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर क्या मुंह लेकर जायें। आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया के बाद भाऱतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती या कमजोरी इस तथ्य से नहीं आंकी जाती कि इसमें कितने बेरोजगार हैं या कितने किसानों ने आत्महत्या की है। इसे क्रूर मजाक ही कहा जा सकता है कि जिन दिनों शेयर बाजार में अभूतपूर्व तेजी चर्चा में है, उन्ही दिनों यूएनडीपी की रिपोर्ट में आया यह तथ्य अपेक्षाकृत कम चर्चित रहा कि अपने नवजात शिशुओं को सुरक्षित रखने के मामले में बंगलादेश भारत से आगे निकल गया है। पर शिशु मृत्यु दर की राजनीति और सेनसेक्स की राजनीति में फर्क यह है कि सेनसेक्स का गिरना सरकार को, नेताओं को परेशान करता है, और शिशु मृत्यु दर के न गिरने से सरकार और नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता।

      इसलिए सेनसेक्स को लेकर प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, सेबी के अफसर, सीबीआई के अफसर लगातार मीटिंग कर रहे हैं, पर कुछ भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि ये हो क्या रहा है। दरअसल वित्त मंत्रालय समेत सरकार की कोई भी एजेंसी पक्के तौर पर यह बताने की स्थिति में नहीं है कि शेयर बाजार में आखिर हो क्या रहा है। एक समय वित्तमंत्री पी चिदंबरम् ने बयान दिया था कि वह तब चिंतित होंगे, जब शेयर सूचकांक आठ हजार बिंदु से ऊपर चला जायेगा। 8 सितंबर, 2005 को सूचकांक आठ हजार बिंदु से ऊपर चला गया। फिर वित्तमंत्री का बयान आया कि सब कुछ ठीक ठाक है। एक दिन सूचकांक की बढ़ोत्तरी पर प्रधानमंत्री के चिंतित होने की बात छपती है, तो दूसरे दिन इसका खंडन छपता है।

      इसका कारण सन् 1992 का हर्षद मेहता घोटाला है। उस दौर में जब शेयर बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा था, तो तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह का बयान था कि वह शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव पर अपनी नींद नहीं खोते। बाद में जब घपला सामने आया, तो पता लगा कि शेयर बाजार के अचानक उठान के पीछे. वह अकूत रकम थी, जो हर्षद मेहता अपने फर्जी कारोबार के चलते बैंकों से ले रहे थे। इस घपले के सामने आने पर सरकार की नींद वाकई उड गयी।

      इसलिए वित्त मंत्री समय-समय पर इस आशय के बयान देते रहते है ताकि सनद रहे कि वित्त मंत्री चिंतित थे। पर वित्तमंत्री की चिंताओं का बाजार पर बुरा असर न पड़े, इसलिए वित्तमंत्री अपने एक बयान के विपरीत में दूसरा बयान भी देते रहते हैं। मौका-मुकाम देखकर किसी भी बयान का प्रयोग किय जा सकता है।  सेबी के चेयरमैन इस तरह की बयानबाजी के मामले में वित्तमंत्री के ही रास्ते पर चल रहे हैं।

      दरअसल, वित्तमंत्री नहीं चाहते कि बाजार बहुत तेजी से ऊपर जाये और ये भी नहीं चाहते कि यह नीचे जाये। बाजार के नीचे जाने का अर्थ होगा कि सेनसेक्स की उठान को सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश नहीं किया जा सकेगा। ऐसा यह सरकार नहीं चाहेगी, दरअसल कोई भी सरकार नहीं चाहेगी।

      इसलिए शेयर बाजार की राजनीति से जुड़े बयान सारे भ्रम फैलाने वाले होंगे।

      एक भ्रम सेनसेक्स और अर्थव्यवस्था को लेकर है। इस जनवरी से लेकर अब तक सेनसेक्स में करीब 29 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो चुकी है। अब से करीब डेढ़ साल पहले सेनसेक्स 14 मई, 2004 को 5070 बिंदु पर बंद हुआ था। डेढ़ साल में अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या करीब सत्तर प्रतिशत सुधर गयी, जो सेनसेक्स में इस अवधि में करीब सत्तर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी। यह सवाल खासा जटिल सवाल है, जिसका जवाब आसानी से नहीं तलाशा जा सकता।

      इसका जवाब पूरे देश के अर्थशास्त्र के विश्लेषण में नहीं है। इसका जवाब शेयर बाजार के आंतरिक अर्थशास्त्र से संबंधित है, वित्तीय निवेश यानी विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा किये जाने वाले निवेश से है। तमाम कंपनियों के प्रमोटरों द्वारा किये जा रहे खेल से संबंधित हैं। यह सब कुछ वित्तीय अर्थशास्त्र के तहत आता है।

      विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए भारतीय शेयर बहुत तेजी से आकर्षक होते जा रहे हैं। इसके कई कारण हैं। एक तो विकसित बाजारों में शेयरों में ज्यादा कमाई नहीं हो रही है। भारतीय बाजार विकसित बाजारों के मुकाबले बहुत आकर्षक दिखायी दे रहे हैं। तमाम सर्वेक्षणों, अध्य़यनों में भारतीय वित्तीय क्षेत्र को आकर्षक बताया जा रहा है। अच्छी कंपनियों के शेयरों की उपलब्धता उनकी मांग के मुकाबले कमजोर ही है। इसलिए यह नहीं माना जाना चाहिए कि किसी कंपनी के शेयर के भाव बढ़ने के पीछे उसकी गुणवत्ता में हुई बढ़ोत्तरी है। यह सीधा-साधा मांग और पूर्ति का खेल है। अचानक बाजार में मांग बढ़ गयी है और आपूर्ति उस स्तर पर नहीं हो पा रही है।

      पर इसमें एक खेल और है, जिससे निवेशकों और खासकर छोटे निवेशकों को सावधान रहना चाहिए। बाजार की इस तेजी का फायदा उठाकर कई कंपनियों के प्रवर्तक अपने शेयरों को ऊंचे भावों पर बेचकर बाजार से निकलना चाहते हैं। इस तरह के सौदे कुछ इस तरह से होते हैं- मरणासन्न या लगभग बीमार पड़ी कंपनियों को प्रवर्तक निदेशक अपनी कंपनी के शेयर बाजार में खरीदवाना शुरु करते हैं। जाहिर है, ऐसी स्थिति में भाव बढ़ जाते हैं। इन बढ़े हुए भावों को देखकर तमाम और निवेशक ऐसे शेयरों में दिलचस्पी दिखाते हैं। बढ़े हुए भाव पर निवेशक ऐसी कंपनियों के शेयर खरीद लेते हैं, और प्रवर्तक अपने शेयर बाजार में बढ़ हुए भावों पर बेचकर निकल जाते हैं। ऐसी स्थिति में छोटे निवेशकों के हाथ में सिवाय पछताने के कुछ नहीं रहता।

       ऐसे ही निवेशकों के लिए नेशनल स्टाक एक्सचेंज ने चेतावनी जारी की है कि कई खस्ताहाल प्रबंधन वाली कंपनियों के शेयरों में जो निवेशक निवेश कर रहे हैं, उन्हे सावधानी से काम करना चाहिए। निवेशकों को ऐसी कंपनियों से सावधान रहना चाहिए, जिनकी कीमतों और ट्रेड किये जाने वाले शेयरों की संख्या में भारी उछाल दिखायी देता हो।

       अतीत के अनुभव यह बताते हैं कि इस तरह की चेतावनियों के बावजूद निवेशक चोट खाते हैं,क्योंकि एक मानवीय वृत्ति का इलाज किसी के पास नहीं है, वह है लालच। कम समय में मोटी कमाई का लालच शेयर बाजार में हमेशा मरवाता है, इस बार भी मरवायेगा।

       कुल मिलाकर समझने की बात यह है कि अभी जो खेल चल रहा है, उसमें मगरमच्छ यानी बड़े खिलाडी तो पार निकल जायेंगे, पर छोटी मछलियां बड़ी मछलियों द्वारा खायी जायेंगी। पहले भी ऐसा होता रहा है। इस बार भी ऐसा हो तो, आश्चर्य नहीं है। वह कहावत झूठ तो नहीं है-इतिहास से हम सिर्फ यह सबक लेते हैं कि इतिहास से हम कोई सबक नहीं लेते।