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     विदेशी हवाओं में उड़ते भाव

                    आलोक पुराणिक

      राबर्ट कियोसाकी की एक प्रसिद्ध पुस्तक है-रिच डैड, पुअर डैड यानी अमीर पापा, गरीब पापा। कियोसाकी इस पुस्तक में समझाते हैं कि गरीब लोग पैसे के लिए काम करते हैं और अमीर लोगों के लिए पैसा काम करता है। कहने का आशय यह है कि गरीब पापा मेहनत-मजदूरी नौकरी करके कमाते हैं और अमीर पापा शेयर में, प्रापर्टी में निवेश करके चैन से सोते हैं। उनका यह निवेश उनके लिए काम करता है। और अंत में अमीर पापा और अमीर हो जाते हैं और गरीब पापा को अपनी आय बढ़ाने के लिए और ज्यादा काम करना पड़ता है।

इस सिद्धांत को समझने के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के छह महीने सबसे मुफीद हैं। शेयर बाजार और प्रापर्टी में लगाने वाले अमीर पापा बहुत तेजी से अमीर हो गये हैं। सोने में लगाने वाले भी अमीर हुए हैं। अर्थव्यवस्था में ऐसा कम होता है, जब शेयर बाजार, प्रापर्टी बाजार और सोने के बाजार में तेजी एक साथ आये। ऐसा अभी भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहा है। मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक करीब 8,200 बिंदुओँ के आसपास टहल रहा है। महत्वपूर्ण शहरों में प्रापर्टी के भावों में पिछले छह महीनों में करीब पच्चीस प्रतिशत का उछाल आया है। सोना भी अपने उच्चतम स्तर यानी करीब सात हजार रुपये प्रति दस ग्राम के आसपास चल रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है, यह सवाल आजकल निवेश जगत में पूछा जा रहा है। अब तक ऐसा होता रहा है कि ऊंचे स्तर के निवेशक प्रापर्टी और शेयर बाजार में मौका देखकर निवेश करते थे। शेयर बाजार जब गिरा हुआ होता था, तो उसका पैसा निकलकर प्रापर्टी में लगता था और प्रापर्टी बाजार जब गिरा हुआ होता था, तब उसका पैसा निकल शेयर बाजार में लगता था। इसलिए भारतीय परिस्थितियों में देखा यह जाता था कि जब शेयर बाजार तेजी पर होते थे, तब प्रापर्टी के बाजार में मंदी होती थी। जब प्रापर्टी का बाजार तेजी पर होता था, तो शेयरों का बाजार ठंडा होता था।

      सारे बाजारों में आयी चकाचक तेजी की वजहों की पड़ताल करें, तो यह साफ होता है कि अब भारत में किसी बाजार की तेजी और गिरावट के लिए सिर्फ आंतरिक कारण जिम्मेदार नहीं रहे, बाहरी हवाएं तमाम बाजारों में भावों को उड़ाये ले जा रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था उन लोगों के लिए तेजी से भूमंडलीकृत हो रही है, जिनके पास निवेश के लिए मोटी रकम है।

      प्रापर्टी के बाजार को देखें, तो पिछले छह महीनों में बड़े और मंझोले स्तर के शहरों में भी भावों में पच्चीस प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। बंगलूर, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुड़गांव, चेन्नई, जयपुर में भाव अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। प्रापर्टी के भाव इतनी तेजी से बढ़ने के प्रमुख कारणों में से एक है-सूचना-प्रौद्योगिकी, साफ्टवेयर के कारोबार से जुड़े निर्माण कार्य में तेजी। साफ्टवेयर कारोबार के पास डालरों और पौंडों में कमाया गया पैसा है। पहले जिन इलाकों में विदेशी राजदूत, या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम कर रहे अधिकारी रहते थे, वे इलाके महंगे हो जाया करते थे। अब ये बात उन इलाकों पर लागू होती है, जहां साफ्टवेयर, सूचना-प्रौद्योगिकी कारोबार में रहने वाले लोग रहते हैं या काम करते हैं। जाहिर है, डालर पौंड में कमाने वालों को रुपयों में भुगतान खासा सस्ता लगता है। बंगलूर, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, गुड़गांव, चेन्नई सूचना-प्रौद्योगिकी कारोबार के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

      एक अनुमान के मुताबिक नये हो रहे निर्माण कार्य में सत्तर प्रतिशत सूचना-प्रौद्योगिकी से जुड़ा ही है। या तो टेकनोलोजी, साफ्टवेयर पार्क बन रहे हैं या फिर उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के रहने के लिए कालोनियां बन रही हैं। विदेशी निर्माताओं को भारत में काम करने की इजाजत दिये जाने के बाद इस धंधे के पैमाने खासे बदल गये हैं। दिल्ली मुंबई में पांच-सात करोड़ रुपये के एक फ्लैट वाली परियोजनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। साफ्टवेयर द्वारा विदेश से कमाया गया पैसा, विदेशी निर्माताओं द्वारा बनायी जा रहीं आलीशान परियोजनाएं और फिर आप्रवासी भारतीयों द्वारा इस क्षेत्र में दिखायी जा रही रुचि के चलते इस क्षेत्र में भाव बहुत ऊंचे जा रहे हैं।

      प्रापर्टी के क्षेत्र के कारोबारी आंकड़े जुटाना बहुत मुश्किल इसलिए है,क्योंकि इस क्षेत्र में कारोबार का एक हिस्से का लेखा-जोखा कागजों पर नहीं होता। एक मोटे अनुमान के हिसाब से भारत में अभी रिहाईशी, व्यापारिक आदि प्रापर्टी का सालाना बाजार करीब 50 अरब डालर यानी करीब दो लाख तीस हजार करोड़ रुपये का है। विदेशी निर्माताओं को इस क्षेत्र में काम करने की इजाजत देने के बाद इस क्षेत्र में बड़ी तादाद में बाहर का पैसा लगने की उम्मीद है। हाल में कुछ आप्रवासी भारतीयों ने 15 करोड़ डालर का फंड बनाया है, सिर्फ इस बात के लिए कि भारतीय प्रापर्टी बाजार से कैसे कमाया जाये। तमाम मुचुअल फंडों ने सिर्फ प्रापर्टी बाजार से कमाने के लिए रकम इकठ्ठी करनी शुरु की है। अनुमान के मुताबिक इस साल के अंत करीब चार हजार करोड़ के रुपये की रकम मुचुअल फंडों के पास सिर्फ प्रापर्टी बाजार के लिए ही होगी। ये सारी रकम प्रापर्टी बाजार की तेजी को और बढ़ायेगी।

 इस बाजार में औसतन बीस प्रतिशत सालाना की बढ़ोत्तरी की उम्मीद है। इस क्षेत्र में विकास का अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि तीन साल पहले यानी 2002 में देश में कुल तीन शापिंग माल थे। अब दिल्ली से सटे  गाजियाबाद के पांच किलोमीटर के क्षेत्र में ही तीन शापिंग माल हैं। 2007 तक देश में करीब 250 शापिंग माल होंगे। शापिग माल के कारोबार में इतनी तेज बढ़ोत्तरी विश्व के किसी भी हिस्से में कभी भी नहीं हुई थी। प्रापर्टी बाजार में तेज बढ़ोत्तरी के लिए घरेलू कारक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। दस साल पहले मकान मालिक बनने की औसत आयु 45 साल थी, यह गिरकर अब 32 साल हो गयी है। पर बाजार में असली तेजी आयी है साफ्टवेयर की कमाई और आप्रवासियों की रुचि के चलते।

सोने की हालत भी कुछ ऐसी है कि विदेशी अर्थव्यवस्थाओं में हो रहे घटनाक्रम के चलते भारत में सोने के भाव बढ़ रहे हैं। पेट्रोल के भाव बढ़ रहे हैं, पेट्रोल की कमाई का बड़ा हिस्सा सोने में जा रहा है। विकसित देशों में बढ़ती मुद्रा-स्फीति के चलते भी सोने की मांग में बढ़ोत्तरी होती है। मुद्रा-स्फीति की सूरत में लोग सोने में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं। भारत में सोने के भाव अपने उच्चतम स्तर पर चल रहे हैं तो तमाम महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में ये भाव  17 -18 सालों के उच्चतम भावों पर चल रहे हैं। गौरतलब है कि भारत की सोने की मांग की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा आयात से ही आता है। तेजी से विकसित होती भारतीय अर्थव्यवस्था में सोने की मांग का यह हाल है कि इस साल के पहले छह महीनों में ही भारतवासी 508 टन सोना खरीद चुके हैं,जबकि पिछले पूरे साल में 642 टन सोना खरीदा था। पेट्रोल से कमाई डालर जैसे-जैसे बढ़ेंगे, सोने की अंतर्राष्ट्रीय मांग बढ़ेगी और फिर उसके घरेलू भाव भी बढ़ेंगे।

      उधर शेयर बाजार को चलाने वाले कारक तो बहुत  अरसे से देश से बाहर जा चुके हैं। घरेलू वित्त्तीय संस्थान चाहे बिकवाली पर उतर आयें, पर विदेशी निवेशक संस्थानों की लगातार खरीद के चलते बाजार 20 जून, 2005 के 7000 बिंदुओं से आठ हजार को पार कर चुका है। 2004 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों में करीब 8.5 अरब डालर का निवेश किया था, इतना निवेश विदेशी संस्थागत निवेशक साल पूरा होने से पहले ही कर चुके हैं।   

कुल मिलाकर विदेशी हवाओं में भारत के शेयर बाजार, प्रापर्टी और सोना बाजार के भाव उड़ रहे हैं। दिक्कत कुल इतनी है कि भारत की जनसंख्या की अधिकांश जनसंख्या कियोसाकी के हिसाब से गरीब पापाओं वाली श्रेणी में आती है, सो इस उड़ान का फायदा उन्हे होने की उम्मीद न के बराबर है।