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भारतमाता नोटदायिनी
आलोक पुराणिक
भारतमाता ग्रामवासिनी........बरसों पहले मैथिलीशरण गुप्त ने जब यह लिखा था, तो उन्हे शायद पता नहीं कि वह एक मार्केटिंग मंत्र लिख रहे हैं, जिसका प्रयोग तमाम कंपनियों के मैनेजर सन् 2000 के आसपास करेंगे।
तमाम कंपनियों का नया मार्केटिंग मंत्र है-गांव चलो।
और गांव जाने की ठोस वजहें हैं।
विश्व की करीब दस फीसदी जनसंख्या भारत के गांवों में रहती है।
यानी करीब सत्तर करोड़ उपभोक्ता या संभावित उपभोक्ता गांवों में हैं।
गावों के बाजारों में विकास की दर शहर के बाजारों की विकास दर के मुकाबले दोगुनी है।
नेशनल काउंसिल फार अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च(एनसीएईआर) के अध्ययन के मुताबिक मध्यवर्ग या इससे ऊपर की आर्थिक हैसियत के ग्रामीण परिवारों की संख्या इस हैसियत के शहरी परिवारों के बराबर ही है।
निम्न मध्यमवर्गीय आर्थिक हैसियत वाले परिवारों की संख्या इस हैसियत के ग्रामीण परिवारों के मुकाबले दोगुनी है।
उच्च आयवर्ग की हैसियत वाले करीब 16 लाख परिवार ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
पर बात सिर्फ इतनी सी नहीं है. भविष्य के अनुमान बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ परिवारों में अमीरी चकाचक होने वाली है। नेशनल काउंसिल फार अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च(एनसीएईआर) के आंकड़ों के मुताबिक 2007 तक ग्रामीण क्षेत्रों में मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय हैसियत करीब 11 करोड़ परिवार होंगे। शहरी क्षेत्रों में ऐसे परिवारों की संख्या करीब छह करोड़ होगी। यानी ग्रामीण इलाकों में दोगुने संभावित ग्राहक पाये जायेंगे, शहरी क्षेत्रों के मुकाबले।
भारत के गांव बदल रहे हैं, बदल रहे हैं इस मायने में कि वहां पर बिजली भले ही न हो, पांच रुपये वाला कोक, पांच रुपये वाला टाइगर बिस्कुट और तमाम ब्रांडों के शैंपू के पाउच जरुर मिल जायेंगे। ग्रामवासिनी भारतमाता तमाम कंपनियों के लिए नोटदायिनी साबित हो रही है।
--शहर में कितने आइटम बेचे जा सकते हैं अब। खास तौर पर बड़े शहरों में मार्केटिंग के जरिये दो टीवी बेचने की बात कर ली गयी है। और कितने टीवी बेचे जा सकते है। जिस घर में एक बार फ्रिज चला गया, वह कम से कम दस साल तो दूसरा फ्रिज खरीदने नहीं आ रहा है, तो माल कहां बेचा जायेगा। नया बाजार तो गांवों में ही बनेगा-यह कहना है सुबोध शर्मा का। श्री शर्मा एक टीवी कंपनी की मार्केटिंग से जुड़े हुए हैं।
पर गांवों में हर माल बेचना आसान नहीं है।
बिजली से चलने वाले टिकाऊ उपभोक्ता साज-सामान को गांवों में बेचना आसान इसलिए नहीं है कि वहां सबसे बड़ी समस्या बिजली की है।
--कई बार सोचता हूं कि 21 इंच के टीवी को एक्सचेंज करके बड़ा टीवी खरीद लूं, पर फिर सोचता हूं कि यहां बिजली रहती ही कितनी है, जो टीवी देख पाऊंगा-यह कहना है दनकौर के पवन दीक्षित का। दनकौर दिल्ली के पास का एक कस्बानुमा गांव या गांवनुमा कस्बा है।
भारत के गांवों में बिजली की स्थिति पर तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां चिंतित हैं और समय-समय पर बिजली सुधारों की जो चर्चा जोर-शोर से होती है, वह अनायास नहीं है। फ्रिज, टीवी, कंप्यूटर समेत तमाम बिजली के सामान से चलने वाली चीजों को बनानेवाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस तरह की चर्चा के पीछे रहती हैं।
टिकाऊ उपभोक्ता साज-सामान को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-एक लगभग आवश्यक आइटम-जैसे ट्रांजिस्टर, हाथघड़ी, साइकिल। दूसरी श्रेणी को उभरती श्रेणी माना जा सकता है, इसमें काले-सफेद टीवी को रख सकते हैं। तीसरी श्रेणी में जीवन-शैली से जुड़े उप्तादों को रखा जा सकता है, इसमें रंगीन टीवी, फ्रिज जैसे उत्पादों को रखा जा सकता है। गांवों में पहली और दूसरी श्रेणी के उत्पादों की बिक्री की जोरदार संभावनाएं हैं।
पर गांव में चकाचक बाजार है-गैर टिकाऊ उपभोक्ता साज-सामान का। इस धंधे से जुड़ी एक बहुराष्टीय कंपनी का आकलन है कि साबुन, वाशिंग पाऊडर जैसे गैर-टिकाऊ साज-सामान का ग्रामीण बाजार करीब 63,500 करोड़ रुपये का है। ऐसे आइटमों का शहरी बाजार 49,500 करोड़ रुपये का है। इसकी वजह साफ है कि गांवों में जनसंख्या अधिक रहती है। साबुन, शैंपू जैसे आइटमों की खपत का ताल्लुक सीधे तौर पर जनसंख्या से होता है।
पर गांवों में माल बेचना शहर में माल बेचने से अलग होता है।
एक मोटरसाइकिल की मार्केटिंग से जुड़े डीलर बताते हैं-गांवों में सिर्फ विज्ञापन के आधार पर चीजें नहीं खरीदी जातीं। करीब अस्सी प्रतिशत मामलों खरीद मित्रों और रिश्तेदारों से पूछकर होती है। लोग बहुत ठोंक-बजाकर चीजों को लेते हैं।
ग्रामीण मार्केटिंग से जुड़े सुबोध शर्मा बताते हैं कि गांवों में चूंकि समय इफऱात में होता है, इसलिए हर चीज को खरीदने से पहले उसके बारे में पूरी दरय़ाफ्त करने की फुरसत ग्राहक के पास होती है। शहरी उपभोक्ता को विज्ञापन के माध्यम से प्रभावित करना ज्यादा आसान है, पर ग्रामीण उपभोक्ता विज्ञापन से उस तरह से प्रभावित नहीं होता है।
ग्रामीण मार्केटिंग पर गहन अध्ययन करने वाले प्रोफेसर के के जैन का कहना है कि ग्रामीण मार्केटिंग में कीमत की बहुत अहमियत है। उनका मानना है कि कोक ने अपने उत्पाद की कीमत पांच रुपये ग्रामीण बाजारों को देखते हुई ही की है। ब्रिटेनिया के टाइगर बिस्कुट पांच रुपये में उतारे गये थे। और तो और शैंपू का पाउचीकरण भी गांवों के बाजार को देखते ही किया गया।
प्रोफेसर जैन की बात को आंकड़े पुष्ट करते हैं। ओआरजी-मार्ग के सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में बिकने वाले कुल शैंपू का 95 प्रतिशत पाउचों के जरिये बिकता है।
एक अध्ययन के मुताबिक जिन गांवों की जनसंख्या 2000 से ऊपर होती है, उनमें आम तौर पर एक आटो मैकेनिक या बिजली के आइटम ठीक करने वाला पाया जाता है। ये दोनों ही अपने इलाके में एक्सपर्ट की हैसियत रखते हैं। इनकी राय की खासी अहमियत होती है। इसलिए तमाम कंपनियां इन एक्सपर्टों को सैट करती हैं, उपहार देकर या उनकी दुकान की पेंटिंग कराके।
प्रोफेसर जैन के मुताबिक ये आटो मैकेनिक और इलेक्ट्रिशियन तमाम कंपनियों के लोकल ब्रांड अंबेसडर के बतौर काम कर रहे हैं।
गांव में मार्केटिंग के तौर-तरीके काम नहीं करते, जो शहरों में काम कर जाते हैं। इसकी एक वजह यह है कि ग्रामीण भारत की रुचियां कई मामलों में शहरी उपभोक्ताओं से अलग हैं। उदाहरण के लिए पंजाब के गांवों में मार्केटिंग के माध्यम हैं-तमाम खेल टूर्नामेंट। तमाम कबड्डी टूर्नामेंट पंजाब में लोकप्रिय हैं। उत्तर भारत के शहरों में कवि सम्मेलनों की लोकप्रियता को भी मार्केटिंग के लिए भुनाया जाता है। अब ऐसे कई कवि सम्मेलन हैं, जिन्हे किसी कंपनी ने प्रयोजित किया होता है। तर्क वही है, कि जैसे भी गाहक तक पहुंचना हो, पहुंचेंगे। टीवी विज्ञापन के जरिये नहीं, तो कबड्डी टूर्नामेंट के जरिये ही।
ग्रामीण उपभोक्ता के पास जानकारियां कम भले ही हों, पर वह बेवकूफ नहीं है। और फिर अब संचार क्रांति ने स्थितियां बहुत बदल दी हैं। ग्रामीण ग्राहक पहले अपने शहर के किसी रिश्तेदार, मित्र से किसी चीज के भाव पता कर लेता है। फिर सौदेबाजी करता है। कई ऐसे हैं, जो दिल्ली के रेट पर चीजें चाहते हैं बाह में या मानिकपुर में-यह कहना है टीवी की मार्केटिंग से जुड़े एक सेल्स एक्जीक्यूटिव का।
प्रोफेसर के के जैन कहते हैं कि ग्रामीण मार्केटिंग दो तत्वों पर टिकी हुई है-पहुंच और कीमत पर। यानी कोई उत्पाद गांवों में उपलब्ध हो और उस कीमत पर उपलब्ध हो, जो औसत ग्रामीण उपभोक्ता की पहुंच के दायरे में हो। इन दोनों तत्वों को साधना थोड़ा टेढ़ा मामला है। अगर दूर-दराज गांवों में कोई चीज पहुंचायी जाये, तो उसकी परिवहन लागत उसकी कीमत को बढ़ा सकती है। ऐसे में कम कीमत को साधना एक बड़ी चुनौती है।
पर भारतीय ग्रामीण बाजारों को साधना आसान है, ऐसा कब और किसने कहा। उपभोक्ता साज-सामान के बाजार में जो कंपनी इन चुनौतियों का सामना कर पायेगी, वही भविष्य में चकाचक मुनाफे बटोरेगी।
बाक्स नंबर एक
कर्ज की पीओ, चकाचक जीओ
कर्ज की पीते थे मय........जब मिर्जा गालिब ने यह कहा था, तब सोचा न होगा कि वह ग्रामीण उपभोक्तावाद के बारे में कुछ कह रहे हैं।
हाल के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण उपभोक्ता कर्ज लेकर उपभोक्ता साज-सामान लेने के मामले में संकोच कम कर रहे हैं।
उपभोक्ता साज-सामान खरीदने के लिए गये कर्ज की प्रति वर्ष बढ़ोत्तरी का प्रतिशत
1992-93 से 1995-96 तक 1998-99 से 1999-2000 तक
शहरी उपभोक्ता 19.6 17.4
ग्रामीण 20.4 39.6
कुल 19.8 23.9
उपभोक्ता साज-सामान के लिए कर्ज की बढ़ोत्तरी दर ग्रामीण इलाकों में तेजी से बढ़ रही है। करीब पांच साल की अवधि यह दर दोगुनी हो गयी है।
यानी ग्रामीण उपभोक्ता तमाम आइटमों की खऱीद के लिए उपलब्ध फाइनेंस योजनाओं का लाभ उठाने से परहेज नहीं कर रहा है। और इस मामले में उसने अपने शहरी भाई को बहुत पीछे छोड़ दिया है। दरअसल गांवों में तेजी से पनपते उपभोक्तावाद की एक वजह यह भी है कि तमाम आइटमों की खरीद पर अब फाइनेंस सुविधा उपलब्ध है।
बैंक और फाइनेंस करने वाली तमाम कंपनियों को भी अपने कारोबार का विस्तार ग्रामीण इलाकों में करने का अवसर मिल रहा है। उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले सालों में बैंकों और फाइनेंस करने वाली संस्थाओं के कारोबार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गांवों से ही आयेगा। इसलिए गांव सिर्फ टीवी-फ्रिज कंपनियों के निशाने पर ही नहीं है, बल्कि तमाम बैंकों और फाइनेंस करने वाली संस्थाओं के निशाने पर भी हैं।